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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
पतङ्गाग्निसमां वृत्तिमास्थाय़ात्मविनाशिनीम् |  ४६   क
न्याय़तो युध्यमानस्य प्राणत्यागो न संशय़ः |  ४६   ख
छद्मना तु भवेत्सिद्धिः शत्रूणां च क्षय़ो महान् ||  ४६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति