शान्ति पर्व  अध्याय ३९

वैशम्पाय़न उवाच

धन्या त्वमसि पाञ्चालि या त्वं पुरुषसत्तमान् |  ५   क
उपतिष्ठसि कल्याणि महर्षीनिव गौतमी ||  ५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति