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शल्य पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
रूक्षाश्च वाताः प्रववुर्नीचैः शर्करवर्षिणः |  ११   क
गिरीणां शिखराण्येव न्यपतन्त महीतले ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति