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शान्ति पर्व
अध्याय १९४
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मनुरु उवाच
मत्स्यो यथा स्रोत इवाभिपाती; तथा कृतं पूर्वमुपैति कर्म |  २१   क
शुभे त्वसौ तुष्यति दुष्कृते तु; न तुष्यते वै परमः शरीरी ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति