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सभा पर्व
अध्याय ३९
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वैशम्पाय़न उवाच
उत्पतन्तं तु वेगेन पुनः पुनररिन्दमः |  १७   क
न स तं चिन्तय़ामास सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति