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वन पर्व
अध्याय ३९
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जनमेजय़ उवाच
कथं स पुरुषव्याघ्रो दीर्घवाहुर्धनञ्जय़ः |  २   क
वनं प्रविष्टस्तेजस्वी निर्मनुष्यमभीतवत् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति