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वन पर्व
अध्याय ३९
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जनमेजय़ उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्प्रसादाद्द्विजोत्तम |  ४   क
त्वं हि सर्वज्ञ दिव्यं च मानुषं चैव वेत्थ ह ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति