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वन पर्व
अध्याय ३९
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जनमेजय़ उवाच
अत्यद्भुतं महाप्राज्ञ रोमहर्षणमर्जुनः |  ५   क
भवेन सह सङ्ग्रामं चकाराप्रतिमं किल |  ५   ख
पुरा प्रहरतां श्रेष्ठः सङ्ग्रामेष्वपराजितः ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति