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शल्य पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
रेणुध्वस्तं दीर्घभुजं मातङ्गसमविक्रमम् |  ७   क
वृतं भूतगणैर्घोरैः क्रव्यादैश्च समन्ततः |  ७   ख
यथा धनं लिप्समानैर्भृत्यैर्नृपतिसत्तमम् ||  ७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति