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शान्ति पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
कस्मिंश्चात्मा निय़न्तव्यस्त्रिवर्गविजय़ाय़ वै |  ३   क
सन्तुष्टा नैष्ठिकं वाक्यं यथावद्वक्तुमर्हथ ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति