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वन पर्व
अध्याय २३९
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वैशम्पाय़न उवाच
कुशचीराम्वरधरः परं निय़ममास्थितः |  १७   क
वाग्यतो राजशार्दूलः स स्वर्गगतिकाङ्क्षय़ा |  १७   ख
मनसोपचितिं कृत्वा निरस्य च वहिष्क्रिय़ाः ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति