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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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दुर्योधन उवाच
करिष्यसि जगत्सर्वमपाञ्चालं किलाच्युत |  ८०   क
एवं सिद्धाव्रुवन्वाचो भविष्यति च तत्तथा ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति