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उद्योग पर्व
अध्याय ३९
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विदुर उवाच
अनिर्वेदः श्रिय़ो मूलं दुःखनाशे सुखस्य च |  ४४   क
महान्भवत्यनिर्विण्णः सुखं चात्यन्तमश्नुते ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति