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अनुशासन पर्व
अध्याय ४३
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देवशर्मो उवाच
यद्वै तन्मिथुनं व्रह्मन्नहोरात्रं हि विद्धि तत् |  ४   क
चक्रवत्परिवर्तेत तत्ते जानाति दुष्कृतम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति