वन पर्व  अध्याय २७३

मार्कण्डेय़ उवाच

अविध्यदिन्द्रजित्तीक्ष्णैः सौमित्रिं मर्मभेदिभिः |  १९   क
सौमित्रिश्चानलस्पर्शैरविध्यद्रावणिं शरैः ||  १९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति