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द्रोण पर्व
अध्याय २६
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सञ्जय़ उवाच
स तु संवर्तय़ामास द्वैधीभावेन पाण्डवः |  १७   क
रथेन तु रथाग्र्याणामकरोत्तां मृषा तदा ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति