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शल्य पर्व
अध्याय ३९
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वैशम्पाय़न उवाच
देहन्यासे मनश्चक्रे तमूचुः प्रणताः प्रजाः |  १४   क
न गन्तव्यं महाप्राज्ञ त्राहि चास्मान्महाभय़ात् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति