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शल्य पर्व
अध्याय ३९
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्य राजन्गुरुकुले वसतो नित्यमेव ह |  ४   क
समाप्तिं नागमद्विद्या नापि वेदा विशां पते ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति