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शल्य पर्व
अध्याय ३९
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वैशम्पाय़न उवाच
स निर्विण्णस्ततो राजंस्तपस्तेपे महातपाः |  ५   क
ततो वै तपसा तेन प्राप्य वेदाननुत्तमान् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति