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सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
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कृप उवाच
स गत्वा शिविरं तेषां नाम विश्राव्य चाहवे |  १३   क
ततः कर्तासि शत्रूणां युध्यतां कदनं महत् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति