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सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
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कृप उवाच
कृत्वा च कदनं तेषां प्रभाते विमलेऽहनि |  १४   क
विहरस्व यथा शक्रः सूदय़ित्वा महासुरान् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति