सौप्तिक पर्व  अध्याय ४

कृप उवाच

अनुय़ास्यावहे त्वां तु प्रभाते सहितावुभौ |  २   क
अद्य रात्रौ विश्रमस्व विमुक्तकवचध्वजः ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति