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सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
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कृप उवाच
तदिदं समनुप्राप्तं पश्य मेऽद्य चतुष्टय़म् |  २२   क
यस्य भागश्चतुर्थो मे स्वप्नमह्नाय़ नाशय़ेत् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति