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सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
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कृप उवाच
यथा च निहतः पापैः पिता मम विशेषतः |  २४   क
प्रत्यक्षमपि ते सर्वं तन्मे मर्माणि कृन्तति ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति