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सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
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कृप उवाच
विलापो भग्नसक्थस्य यस्तु राज्ञो मय़ा श्रुतः |  २७   क
स पुनर्हृदय़ं कस्य क्रूरस्यापि न निर्दहेत् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति