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सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
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कृप उवाच
कस्य ह्यकरुणस्यापि नेत्राभ्यामश्रु नाव्रजेत् |  २८   क
नृपतेर्भग्नसक्थस्य श्रुत्वा तादृग्वचः पुनः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति