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सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
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कृप उवाच
यश्चाय़ं मित्रपक्षो मे मय़ि जीवति निर्जितः |  २९   क
शोकं मे वर्धय़त्येष वारिवेग इवार्णवम् |  २९   ख
एकाग्रमनसो मेऽद्य कुतो निद्रा कुतः सुखम् ||  २९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति