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सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
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कृप उवाच
वासुदेवार्जुनाभ्यां हि तानहं परिरक्षितान् |  ३०   क
अविषह्यतमान्मन्ये महेन्द्रेणापि मातुल ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति