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सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
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कृप उवाच
न चास्मि शक्यः संय़न्तुमस्मात्कार्यात्कथञ्चन |  ३१   क
न तं पश्यामि लोकेऽस्मिन्यो मां कार्यान्निवर्तय़ेत् |  ३१   ख
इति मे निश्चिता वुद्धिरेषा साधुमता च मे ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति