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सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
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कृप उवाच
वार्त्तिकैः कथ्यमानस्तु मित्राणां मे पराभवः |  ३२   क
पाण्डवानां च विजय़ो हृदय़ं दहतीव मे ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति