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सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
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कृप उवाच
अहं तु कदनं कृत्वा शत्रूणामद्य सौप्तिके |  ३३   क
ततो विश्रमिता चैव स्वप्ता च विगतज्वरः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति