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सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
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कृप उवाच
आवाभ्यां सहितः शत्रूञ्श्वोऽसि हन्ता समागमे |  ४   क
विक्रम्य रथिनां श्रेष्ठ पाञ्चालान्सपदानुगान् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति