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सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
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कृप उवाच
शक्तस्त्वमसि विक्रान्तुं विश्रमस्व निशामिमाम् |  ५   क
चिरं ते जाग्रतस्तात स्वप तावन्निशामिमाम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति