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सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
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कृप उवाच
विश्रान्तश्च विनिद्रश्च स्वस्थचित्तश्च मानद |  ६   क
समेत्य समरे शत्रून्वधिष्यसि न संशय़ः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति