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सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
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कृप उवाच
न हि त्वा रथिनां श्रेष्ठ प्रगृहीतवराय़ुधम् |  ७   क
जेतुमुत्सहते कश्चिदपि देवेषु पावकिः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति