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सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
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कृप उवाच
ते वय़ं परिविश्रान्ता विनिद्रा विगतज्वराः |  ९   क
प्रभाताय़ां रजन्यां वै निहनिष्याम शात्रवान् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति