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स्त्री पर्व
अध्याय ४
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विदुर उवाच
कुलीनत्वेन रमते दुष्कुलीनान्विकुत्सय़न् |  १२   क
धनदर्पेण दृप्तश्च दरिद्रान्परिकुत्सय़न् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति