शान्ति पर्व  अध्याय ४

नारद उवाच

कर्णस्तेषामापततामेकैकेन क्षुरेण ह |  १७   क
धनूंषि सशरावापान्यपातय़त भूतले ||  १७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति