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शान्ति पर्व
अध्याय ४
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नारद उवाच
ते स्वय़ं त्वरय़न्तोऽश्वान्याहि याहीति वादिनः |  २०   क
व्यपेय़ुस्ते रणं हित्वा राजानो भग्नमानसाः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति