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अनुशासन पर्व
अध्याय ४
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भीष्म उवाच
त्रिलोकविख्यातगुणं त्वं विप्रं जनय़िष्यसि |  ३८   क
सा च क्षत्रं विशिष्टं वै तत एतत्कृतं मय़ा ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति