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वन पर्व
अध्याय १४९
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वैशम्पाय़न उवाच
वार्ताधर्मे ह्यवर्तन्त्यो विनश्येय़ुरिमाः प्रजाः |  ३३   क
सुप्रवृत्तैस्त्रिभिर्ह्येतैर्धर्मैः सूय़न्ति वै प्रजाः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति