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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४
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वैशम्पाय़न उवाच
नान्ववुध्यत तद्राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |  १३   क
श्वेताश्वो वाथ कुन्ती वा द्रौपदी वा यशस्विनी ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति