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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः समानय़ामास धृतराष्ट्रः सुहृज्जनम् |  १५   क
वाष्पसन्दिग्धमत्यर्थमिदमाह वचो भृशम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति