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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४
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वैशम्पाय़न उवाच
अथ भीमः सुहृन्मध्ये वाहुशव्दं तथाकरोत् |  ५   क
संश्रवे धृतराष्ट्रस्य गान्धार्याश्चाप्यमर्षणः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति