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मौसल पर्व
अध्याय ४
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वैशम्पाय़न उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा केशवः परवीरहा |  २१   क
तिर्यक्सरोषय़ा दृष्ट्या वीक्षां चक्रे स मन्युमान् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति