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मौसल पर्व
अध्याय ४
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वैशम्पाय़न उवाच
युक्तं रथं दिव्यमादित्यवर्णं; हय़ाहरन्पश्यतो दारुकस्य |  ४   क
ते सागरस्योपरिष्ठादवर्त; न्मनोजवाश्चतुरो वाजिमुख्याः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति