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वन पर्व
अध्याय ९३
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वैशम्पाय़न उवाच
यस्य यज्ञो वभूवेह वह्वन्नो वहुदक्षिणः |  १८   क
यत्रान्नपर्वता राजञ्शतशोऽथ सहस्रशः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति