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मौसल पर्व
अध्याय ४
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वैशम्पाय़न उवाच
तं निघ्नन्तं महातेजा वभ्रुः परपुरञ्जय़ः |  ४५   क
दारुकश्चैव दाशार्हमूचतुर्यन्निवोध तत् ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति