सभा पर्व  अध्याय ४

वैशम्पाय़न उवाच

तथैव क्षत्रिय़श्रेष्ठा धर्मराजमुपासते |  १८   क
श्रीमान्महात्मा धर्मात्मा मुञ्जकेतुर्विवर्धनः ||  १८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति