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सभा पर्व
अध्याय ४
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वैशम्पाय़न उवाच
गाय़न्ति दिव्यतानैस्ते यथान्याय़ं मनस्विनः |  ३३   क
पाण्डुपुत्रानृषींश्चैव रमय़न्त उपासते ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति